प्याजा और अन्य दरबारी गण भी उपस्थिथ थे । मुल्ला साहब को बीरबर की तारीफ सुनकर अच्छा नहीं लगा और वह मन ही मन में कहने लगा कि इसमें कौन - सी बड़ी बुद्धिमानी है , जिसकी इतनी बढ़ाई हो रही है । इससे कहीं अच्छी पगड़ी तो मैं भी बांध सकता हूँ । बादशाह ने प्रसन्न होकर अगले दिन मुल्ला को अपनी कला प्रदर्शित करने को कहा तथा दरबार के सब कार्यों को निपटाकर बादशाह महल में चले गए । मुल्ला मन - ही - मन बहुत प्रसन्न था । दूसरे दिन वह प्रात : काल जल्दी उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो सभा में सबसे पहले ही जा पहुँचे । जब दरबारी सभा में आने लगे , तो वे देखते ही मुल्ला की पगड़ी की तारीफ करते । अन्त में बीरबल भी बादशाह के साथ आ पहुंचे । बादशाह ने जब मुल्ला की पगड़ी देखी तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई और मुल्ला की पगड़ी की तारीफ करते हुए बोले-
" यह तो बीरबल की पगड़ी से सचमुच कहीं अच्छी बंधी है । " यह सुनकर बीरबल तपाक से बोले-
" जहाँपनाह ! यह मुल्ला साहब की करामात नहीं है बल्कि इनकी स्त्री की है । वास्तव में तारीफ के योग्य इनकी स्त्री है , न कि मुल्ला । उसी के सहयोग से इन्हें आज यह सम्मान प्राप्त हुआ है । यदि मेरी बात सत्य नहीं है तो मुल्ला साहब अपनी पगड़ी खोल दें और आपके सामने दोबारा बांधे । यदि ऐसी सुन्दर पगड़ी दोबारा बांध लेंगे तो ठीक है अन्यथा फिर यह समझा जाएगा कि इन्होंने अपनी स्त्री से बंधवाई है । " बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और मुल्ला साहब को पगड़ी उतार कर दोबारा बांधने का हुक्म दिया । मुल्ला ने पगड़ी उतार ली , किन्तु वे बिना शीशे के पगड़ी नहीं बांध सकते थे । उन्हें इधर
- उधर झांकते हुए देखकर बीरबल बोले-
" क्यों मुल्ला साहब ! क्या चाहिए ? " मुल्ला कुछ न बोल सके और अपनी पगड़ी बांधना शुरू किया , शीशा न देखने के कारण उन्होंने जो पगड़ी बांधी उससे सब दरबारी बादशाह हंस पड़े । मुल्ला बेचारे बहुत लज्जित हुए । बादशाह ने मन - ही - मन बीरबल की तारीफ की । बादशाह मुस्कराकर बोले-" वाह मुल्ला साहब , आपने तो कमाल ही कर दिया , जो काम आप स्वयं न कर सकते , वह अपनी स्त्री से करवाते हैं । "
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